ज़िन्दगी कुछ इस कदर बदलने लगी ,
फूल से पतझड़ की ओर चलने लगी |
रोका हमने हाथो को थामकर ,
पीछे मुडके हाथ
छुड़ा गयी,
वो
हम थे वहीँ देखते उसको हर लम्हा जब वो चली ,
कुछ फूल अपने से अलग किये थे ,
फिर पत्ते भी छोड़ गयी|
खाली बिलकुल हो गयी जब वो ,दुनिया हमे छोड़ गयी |
हम तो न थे ऐसे शोक में कभी ,
पता नहीं गम इस जिंदगानी में शामिल कैसे हो गयी|
महफ़िल रंगीन थी कुछ चंद लम्हात पहले ,
हसीं धुन गूंजी थी हवा में ,
कैसे ये शाम गम्हीन हो गयी|
अभी तो हम थे उन खुशगवार लम्हों में ,
हाय हमसे ये कैसी हिमाकत हुई |
चले फिर हम जोड़ने धागे ज़िन्दगी से,
कमबख्त डोर ही ख़तम हो गयी .....





